
ग्रहण दोष पूजा
सूर्य या चंद्र ग्रहण के प्रभाव से उत्पन्न नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने का उपाय।
ग्रहण दोष पूजा संकल्प
उज्जैन के सिद्ध तीर्थ पर व्यक्तिगत नाम, गोत्र व नक्षत्र द्वारा पूर्ण शास्त्रीय विधि से संकल्प।
उज्जैन आकर व्यक्तिगत पूजन
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ग्रहण दोष निवारण पूजा सूर्य या चंद्र ग्रहण के प्रभाव से उत्पन्न नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने का प्रभावी उपाय है।
सूर्य के साथ राहु/केतु से सूर्य ग्रहण योग और चंद्र के साथ राहु/केतु से चंद्र ग्रहण योग बनता है। पहले से पिता, प्रतिष्ठा और हृदय प्रभावित होते हैं; दूसरे से मन, माता, निद्रा और भावनाएँ।
उज्जैन रामघाट या मंगलनाथ पर शिप्रा स्नान, प्रायश्चित संकल्प, सूर्य/चंद्र यंत्र अभिषेक, गायत्री या चंद्र मूल जप, आदित्य हृदय पाठ और दशांश हवन होता है। चांदी का चंद्र या तांबे का सूर्य दान विधि का अंग है।
अवधि 2.5 से 3 घंटे है। सोमवार, रविवार, ग्रहण काल, पूर्णिमा और अमावस्या विशेष हैं। वास्तविक ग्रहण तिथि पर स्नान-दान का महत्त्व और भी बढ़ जाता है।
यह पूजा आत्मविश्वास की कमी, अवसाद, चिंता, नेत्र-हृदय कमजोरी और सरकारी नौकरी की रुकावट के लिए सुझाई जाती है। माता-पिता के स्वास्थ्य में सुधार की कामना से भी यह करवाई जाती है।
पंडित दीपक पंड्या कुंडली देखकर बताते हैं कि सूर्य पक्ष की शांति चाहिए या चंद्र पक्ष की, अथवा दोनों। गलत एकतरफा उपाय से लाभ अधूरा रहता है।
यजमान सात्त्विक वस्त्र पहनें। ग्रहण काल में भोजन-शयन के शास्त्रोक्त नियम सरल भाषा में बताए जाते हैं, ताकि भय नहीं, समझ बने।
ऑनलाइन संकल्प में लाइव अभिषेक दिखाया जाता है। जो उज्जैन आते हैं उन्हें घाट और मुहूर्त का मार्गदर्शन मिलता है।
पूजा के बाद नियमित सूर्य नमस्कार या सोमवार व्रत का छोटा अभ्यास फल को स्थिर करता है। आचार्य यजमान की शक्ति के अनुसार ही व्रत बताते हैं।
उज्जैन की शिप्रा और महाकाल ऊर्जा ग्रहण जनित मलिनता को धोकर मन को पुनः प्रकाश देती है। यही इस पूजा का आध्यात्मिक सार है।
सूर्य पक्ष की शांति में लाल वस्त्र और ताम्र दान, चंद्र पक्ष में श्वेत वस्त्र और चांदी/चावल दान—यह भेद हम पहले बता देते हैं।
मानसिक तनाव वाले यजमानों को जल्दबाज़ी वाला लंबा अनुष्ठान नहीं थोपा जाता। लघु शांति से आरंभ भी हो सकता है।
ग्रहण के दिन जल, तुलसी और नाम जप घर पर भी चल सकता है। उज्जैन पूजा उसके साथ जुड़कर पूरा चक्र बनती है।
माता-पिता दूर हों तो उनके नाम से तर्पण-सा छोटा अंश भी जोड़ा जा सकता है। आचार्य कुंडली देखकर तय करते हैं।
यह पूजा अंधविश्वास फैलाने के लिए नहीं, ग्रहण योग की भारी छाया को हल्का करने के लिए है। समझ के साथ करवाएँ।
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