
पितृ दोष पूजा
सिद्धवट धाम उज्जैन में किया जाने वाला अत्यंत प्रभावी पितृदोष निवारण पूजन।
पितृ दोष पूजा संकल्प
उज्जैन के सिद्ध तीर्थ पर व्यक्तिगत नाम, गोत्र व नक्षत्र द्वारा पूर्ण शास्त्रीय विधि से संकल्प।
उज्जैन आकर व्यक्तिगत पूजन
लाइव वीडियो + प्रसाद कूरियर
पितृदोष के कारण जीवन में बाधाएँ आती हैं। सिद्धवट धाम उज्जैन में किया गया पितृदोष निवारण पूजन अत्यंत प्रभावी माना जाता है।
जैसे गया में पिंडदान प्रसिद्ध है, वैसे ही उज्जैन सिद्धवट शक्तिभेद तीर्थ है। मान्यता है कि माता सीता ने भी यहाँ पिंडदान किया था। अतृप्त पूर्वजों को सद्गति यहीं से मिलती है।
लक्षणों में संतान न होना, गर्भपात, मांगलिक कार्यों में विघ्न, घर में बीमारी, धन का व्यर्थ व्यय और अमावस्या जन्म शामिल हैं। कुंडली में पितृ दोष दिखने पर यह पूजा अनिवार्य मानी जाती है।
विधि में शिप्रा तर्पण, सिद्धवट पर पिंडदान, आवश्यकतानुसार नारायण बलि या नागबलि, हवन और ब्राह्मण को अन्न-वस्त्र-छाता-चप्पल दान है। अवधि 2.5 से 3.5 घंटे रहती है।
यह केवल पितृपक्ष तक सीमित नहीं। प्रत्येक अमावस्या, सोमवती अमावस्या, शनिवार या सोमवार भी फलदायी है। पंडित दीपक पंड्या तिथि के अनुसार सही विधान चुनते हैं।
सामग्री—जौ, काले तिल, कुश, सफेद वस्त्र, पंचामृत—हम जुटाते हैं। यजमान को भार नहीं उठाना पड़ता। दक्षिणा तर्पण, त्रिपिंडी या नारायण बलि के स्तर से तय होती है।
परिवार का कोई भी सदस्य नाम-गोत्र से संकल्प ले सकता है। विदेश में बसे लोग ऑनलाइन तर्पण दर्शन कर सकते हैं। पिंडदान स्थल पर होता है।
पूजा के बाद पितरों के प्रति कृतज्ञता, वार्षिक श्राद्ध और गौ-ग्रास का छोटा नियम फल को स्थायी बनाता है। आचार्य घर बैठे सरल उपाय भी बताते हैं।
यह अनुष्ठान भय फैलाने के लिए नहीं, पूर्वजों को मोक्ष और परिवार को आशीर्वाद देने के लिए है। उज्जैन की शिप्रा उसी आशीर्वाद की धारा है।
सिद्धवट की छाया में किया तर्पण वंश में शांति, संतान सुख और घर की स्थिरता लौटाता है। यही पितृ दोष पूजा का परम फल है।
पिंड की संख्या और गोत्र उच्चारण दो बार दोहराया जाता है, ताकि कोई नाम छूटे नहीं। संयुक्त परिवार में यह सावधानी जरूरी है।
नदी किनारे फिसलन और भीड़ रहती है। बुजुर्ग यजमानों के लिए हम स्थिर स्थान और कम चलने वाला क्रम रखते हैं।
यदि गया की यात्रा बाद में करनी हो तो सिद्धवट का तर्पण उसके विपरीत नहीं, पूरक माना जाता है। भय मत पालें।
श्राद्ध का अन्न सात्त्विक और ताज़ा होता है। बचा भोजन अपमानजनक ढंग से नहीं फेंका जाता, विधि से निपटाया जाता है।
पितर प्रसन्न हों तो घर का शोर कम होता है। यह शांति ही सबसे बड़ा प्रमाण है कि तर्पण पहुँच गया।
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